Selected Speeches

​GOOD FRIDAY LEH EASTER SUNDAY PUALA MIZO MIPUI HNENA GOVERNOR OF MIZORAM, LT GEN NIRBHAY SHARMA, PVSM, UYSM, AVSM, VSM (RETD) THUCHAH

Isua Krista hnungzuitute tana hun ropui tak, Good Friday leh Easter Sunday kan hmang tlang leh thei hi lawmawm ka ti a. He ni thianghlimah hian Mizo mipuite thinlung takin chibai ka buk a, Pathianin Mizoram leh Mizote chungah malsawmna vur zel rawh se. Biak in leh hmun hrang hranga he ni thianghlim lawmtu zawng zawng te chu ram chhung bakah khawvel hmun tina remna leh muanna a lo awm zel theih nan lo inhlan thar leh theuh ila, kan tawngtaina ber ni turin ka duh a ni.

India ram hi sakhaw tih bik neilo, tupawhin eng sakhua pawh a biak theihna a ni a, a ram chhunga chengte mi chi hrang hrang kan nih angin kan sakhaw vawn pawh a inang vek lo mahse kan inzahsak tawn zel avangin tun thlengin sakhua avanga buaina lian kan tawk lova a lawmawm hle a. Kan ram ropui tak hi a lo ngelnghet zual zelna turin sakhuana thilah midangte nek chep lova nunho kan zir bakah inngeih tlang taka kan chen za thiam hi a duhawm ber a ni.

Midangte tana malsawmna, nungcha, thing leh mau chunga ngilneih, thilsual ngaih theihlohna leh Pathian Engkimtitheia awm tih rinna hi sakhua zawng zawngin an pawm tlan a ni a. Kristiante inzirtirnaah phei chuan thiltha tih a langsar hle a. Mizoram mipui tam zawkin Kristian sakhua vuantute an nih angin India state danga chengte tan entawn tlak ni chhunzawm tur leh midangte tanpuina kawngah chuan inpe deuh deuh turin he ni thianghlim, Good Friday leh Easter Sunday Ni pual hian ka sawm vek che u a ni.

Good Friday leh Easter Sunday Chibai ule.

Jai Mizoram!

Jai Hind!

SPEECH OF HIS EXCELLENCY LT GENERAL NIRBHAY SHARMA PVSM, UYSM, AVSM, VSM (RETD), GOVERNOR, MIZORAM on Inauguration Function of National Seminar on Hindi at MZU on 27th March, 2017

अभिभाषण

आज की संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष, मिज़ोरम विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. लियानजेला, इस संगोष्ठी के मुख्य संयोजक डॉ रामशरण गौड़, संगोष्ठी समन्वयक प्रो. सुशील कुमार शर्मा अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, सूर्या संस्थान के न्यासी मंत्री श्री देवेन्द्र मित्तल तथा सभागार में उपस्थित मिज़ोरम सरकार के अधिकारीगण, विश्वविद्यालय के गणमान्य सदस्य, भारत के अलग अलग प्रदेशों से आए भाषा विशेषज्ञ विद्वान / विदुषी, तथा साहित्य प्रेमी, प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राओं ।

अत्यंत हर्ष का विषय है कि मिज़ोरम विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग एवं सूर्या संस्थान, नोएडा दोनों मिलकर केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार एवं उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग, मिज़ोरम सरकार के सहयोग से आइजोल में ‘पूर्वोत्तर भारत के हिंदी साहित्य’ में राष्ट्रीय तत्व’ विषय पर एक त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं | नोएडा का सूर्या संस्थान तो इसके लिए विशेष रूप से अभिनंदन का पात्र है जिसने भारत के सुदूरवर्ती प्रदेश मिज़ोरम की राजधानी आइजोल में आकर इस संगोष्ठी का आयोजन किया है | मुझे प्रसन्नता है कि मिज़ोरम विश्वविद्यालय गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की दिशा में आगे बढ़ रहा है । मैं इस संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों से आए हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वानों का अभिनंदन करता हूँ | मिज़ोरमवासियों की तो अपनी यह धरती ही है | यहाँ के हिंदी विद्वानों और हिंदी सेवियों की जितनी प्रशंसा की जाये उतनी कम है, क्योंकि उन्हीं के कारण इस संगोष्ठी का आयोजन संभव हो पा रहा है, आशा है कि यह आयोजन सफल होगा और इसकी जानकारी पूर्वोत्तर ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों तक भी पहुंचेगी | पूर्वोत्तर के आठों राज्य भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए हैं | पूर्वोत्तर की भूमि समग्र भारत राष्ट्र की पहचान कराती है |

पूर्वोत्तर भारत की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता में विशिष्ट भूमिका रही है| स्वतंत्रता संग्राम में यहाँ का इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान हमें गौरवान्वित करता है | समूचे पूर्वोत्तर में भारत की राष्ट्रीय चेतना के स्वर देखने को मिलते हैं | इस सन्दर्भ में हमें श्रीमंत शंकरदेव के नाम का उल्लेख करना आवश्यक है | उनके प्रयासों से वैष्णव भक्ति की धारा सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत में फैली | उत्तर भारत में जो कार्य गोस्वामी तुलसीदास ने किया, वहीँ कार्य पूर्वोत्तर भारत में श्रीमंत शंकर देव ने किया | पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक चेतना के अग्रदूत श्रीमंत शंकरदेव के शिष्य माधव देव ने इस धारा को और गतिमान और सुदृढ़ बनाया | स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व तथा स्वतंत्रता के पश्चात भारत रत्न लोकप्रिय गोपीनाथ बरदले ने इस भूखंड की अखण्डता को अक्षुण्य रखा |

पूर्वोत्तर भारत को संस्कृति संगम की भूमि माना जाता है | सांस्कृतिक वैविध्य और भाषायी विविधता इस धरती के निवासियों की अमूल्य धरोहर है | पूर्वोत्तर भारत के आठों राज्यों की संस्कृति के निर्माण में यहाँ की वैभव संपन्न प्राकृतिक संपदा और मनोरम सौन्दर्य की बड़ी भूमिका है | नदी, झरने, पर्वत, जंगल, विविध प्रकार के पेड़-पौधे और फूल पूर्वोत्तर के निवासियों की आत्मा में निवास करते हैं | पूर्वोत्तर भारत को यहाँ की सुन्दर प्राकृति, सहज और शांत वातावरण ने उपहार में नृत्य, संगीत, कला और सौन्दर्यानुभूति की दृष्टि दी है | उत्सव प्रियता यहाँ के समाज की पहचान है | यहाँ के प्रत्येक जनजातीय समुदाय के पास अपनी भाषा-बोली है, लोकनृत्य है, वाद्ययंत्र हैं, लोक संगीत है और अपने-अपने लोकोत्सव हैं | संस्कृति के ये सभी तत्व समग्र भारत की आत्मा और राष्ट्रीय चेतना के उद्भावक और प्रचारक हैं | यहाँ के लोगों ने अपनी बोलियों, भाषाओं और वाचिक परम्परा के साहित्य और संस्कृति को बचाने के लिए अथक प्रयास किये हैं और अपनी आत्मशक्ति का परिचय दिया है | इस अंचल में लगभग 150 जनजातीय बोलियों और भाषाओं का प्रयोग होता है |

मैंने अनुभव किया है कि पूर्वोत्तर भारत ने अपनी बोलियों और भाषाओं के साथ-साथ हिंदी भाषा को पूरी आत्मीयता तथा सम्मान के साथ अपनाया है | हिंदी संपर्क भाषा के रूप में पूर्वोत्तर भारत में फ़ैल रही है तो पूर्वोत्तर भारत के हिंदी प्रेमी, लेखकों, साहित्यकारों को साहित्य रचना के लिए भी प्रेरित कर रही है | पूर्वोत्तर भारत का हिंदी प्रेम और भाषायी अनुराग अनुकरणीय है | यह भाषानुराग पूर्वोत्तर भारत की आतंरिक सांस्कृतिक समृद्धि और राष्ट्रीय चेतना का द्योतक है |

इसमें संदेह नहीं है कि हिन्दी मिज़ोरम सहित पूरे भारत के राज्यों में फ़ैल रही है | प्रत्येक भाषा में अपनी जीवन-शैली, जीवन-मूल्य और राष्ट्र के प्रति निष्ठा के भाव समाहित होते हैं | हमारे समक्ष स्पष्ट उदाहरण संस्कृत का है जिसने समग्र राष्ट्र को जीवन-मूल्य और सांस्कृतिक तत्व दिये हैं, अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम को जाग्रत करने का सन्देश दिया है| हिंदी और भारत की भाषाएँ संस्कृत से उद्भूत एवं प्रभावित हैं | अत: राष्ट्र चेतना के समस्त तत्व हिंदी के साहित्य में निहित हैं | इनको समझने और जानने की आवश्यकता है | हिंदी भाषा के माध्यम से हम यह जान सकते हैं कि हम भारत के साथ कैसे जुड़े हैं | हमारे पर्वों, उत्सवों और अर्चना पूजा के सूत्र कहाँ – कहाँ व्याप्त हैं | राष्ट्रीय भाव के तत्व कहाँ-कहाँ विद्यमान हैं |

आवश्यकता इस बात की भी है कि पूर्वोत्तर भारत का भाषाओं के साहित्य, यहाँ की परम्पराओं, रीति-रिवाजों की पहचान हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से प्रसारित हो | इससे निश्चित ही पूर्वोत्तर भारत के इन क्षेत्रों से राष्ट्रीय एकता और पारस्परिक सहभाव के सूत्र विकसित होंगे |

इस त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में पूर्वोत्तर एवं देश के अन्य राज्यों से आये हिंदी सेवी विद्वान इस बात पर भी विचार विमर्श करेंगे कि हिंदी भाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दावली, विषयों और भावों के परिचय का आदान-प्रदान किस प्रकार होगा | मिजोरम सहित अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंदी का शिक्षण-प्रशिक्षण हो रहा है, पत्र-पत्रिकाएँ निकल रही हैं, परन्तु हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण, हिंदी पत्रकारिता, हिंदी भाषा और साहित्य के अध्यापन के साथ-साथ पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय भाषाओं-बोलियों के वाचिक साहित्य का व्यापक स्तर पर अनुवाद कार्य हिंदी में होना चाहिए और हिंदी साहित्य का अधिक से अधिक अनुवाद मिजो एवं पूर्वोत्तर की अन्य भाषाओं में होना चाहिए | ई-बुक, ई-पुस्तकालय और जनसंचार माध्यमों से हिंदी-मिज़ो और अंग्रेजी भाषा का परस्पर आदान-प्रदान होना चाहिए । मिज़ो भाषा की पुस्तकों का हिंदी में तथा हिंदी भाषा की पुस्तकों का मिज़ो भाषा में अनुवाद होना चाहिए तथा उन अनूदित ग्रंथों को पाठयक्रम में सम्मिलित किया जाए और उनको मिज़ोरम प्रदेश के सभी पुस्तकालयों तक पहुँचाया जाए ।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाए तथा इस आदान-प्रदान योजना के अंतर्गत हिंदी क्षेत्र के सांस्कृतिक दलों को मिज़ोरम में और मिज़ोरम प्रदेश के सांस्कृतिक दलों को हिंदी राज्यों में भेजा जाए । वर्तमान शिक्षा प्रणाली में हमें परिवर्तन करने पर विचार करना चाहिए । मिज़ो भाषा-भाषी छात्रों के लिए सहज, सरल, सुबोध भाषा में हिंदी पाठय पुस्तकें वार्तालाप शैली में निर्मित होनी चाहिए जिससे संवाद प्रणाली द्वारा हिंदी भाषा का बोध कराया जा सके ।

जनजातीय भाषाओं और बोलियों का ‘जनजातीय भाषा विश्वविद्यालय’ बनाकर हम पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं को नई दिशा दे सकते हैं | मिज़ोरम की मिजो भाषा एक मजबूत अभिव्यक्ति वाली भाषा है | साहित्यिक दृष्टि से भी यह भाषा समृद्ध होती जा रही है | हमें मिजो-हिन्दी साहित्य अकादमी की स्थापना पर भी विचार करना चाहिए तथा पूर्वोत्तर भारतीय अनुवाद अकादमी की स्थापना कर पूर्वोत्तर के साहित्य को हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं तक पहूँचाने पर विचार करना चाहिए| हिंदी इस कार्य में बड़ी भूमिका का निर्वाह कर सकती है | आज पूर्वोत्तर भारत के मूल हिंदी लेखकों तथा अनुवादकों को भी पुरस्कृत करने की जरुरत है | पूर्वोत्तर भारत के मूल हिंदी लेखकों को सम्मानित करने से पूर्वोत्तर में सर्जनात्मक हिन्दी लेखन समृद्ध बनेगा | पूर्वोत्तर भारत से एक हिंदी भाषा विश्वविद्यालय की स्थापना की भी माँग उठती रही है | इस पर भी ध्यान दिया जाना है। पूर्वोत्तर भारत के भाषा एवं साहित्य के प्रचार-प्रसार हेतु एक हिन्दी बेवसाइट एवं ब्लॉग प्रारम्भ होना चाहिए । पूर्वोत्तर भारत के भाषा, साहित्य एवं हिन्दी के पारस्परिक सहयोग को बढ़ाने के लिए एक "साहित्यकार मंच" और पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली एक 'बहुभाषी पत्रिका' का प्रकाशन होना चाहिए ।

भाषाओं द्वारा राष्ट्र निर्माण की दिशा में पूर्वोत्तर भारत में विशालतम ‘केन्द्रीय पूर्वोत्तर भाषा पुस्तकालय’ भी बनाया जाना जरुरी है | इन तमाम बिन्दुओं पर हमें सोचना होगा तभी भाषा, साहित्य और संस्कृति के द्वारा राष्ट्र निर्माण का बड़ा कार्य पूर्वोत्तर भारत के सन्दर्भ में संभव हो सकेगा | जिस निष्ठा और सक्रियता से मिज़ोरम विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. लियानजेला, कुलसचिव, श्री सी. जोथनखुमा, संगोष्ठी समन्वयक प्रो. सुशील कुमार शर्मा, हिन्दी विभाग के प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राओं ने सहयोग दिया उनको साधुवाद देता हूँ । इस संगोष्ठी में भाग लेने वाले सभी विद्वानों और भाषा प्रेमियों का अभिनंदन करता हूँ । आशा है कि इस संगोष्ठी के आयोजन से भारतीय भाषाएँ एक दूसरे के निकट आएँगी और देश में भाषायी समन्वय का संदेश जाएगा ।

जयहिंद जय भारत